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अंकिता भंडारी हत्या कांड :- पर्दे के पीछे का खेल और बीजेपी का अपना जाल

देवेश आदमी

उत्तराखण्ड में अंकिता भंडारी हत्या कांड का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है, लेकिन इसे केवल कांग्रेस द्वारा उठाया गया मुद्दा मानना राजनीतिक समझ की भारी कमी को दर्शाता है। सच्चाई यह है कि यह मामला आज जिस तरह उछाला जा रहा है, उसके पीछे बीजेपी के भीतर चल रही गहरी अंदरूनी खींचतान है। यह आग कांग्रेस ने नहीं, बल्कि बीजेपी के ही एक असंतुष्ट धड़े ने सुलगाई है—और वह भी पूरी रणनीति, रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) और भविष्य की सत्ता गणित को ध्यान में रखकर।

दरअसल, बीजेपी का यह दूसरा धड़ा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा अंकिता भंडारी मामले में CBI जांच न कराए जाने को हथियार बना रहा है। यह धड़ा जानता है कि जनभावनाएं आज भी इस हत्याकांड को लेकर संवेदनशील हैं। आरोप यह नहीं कि मामला नया है, बल्कि आरोप यह है कि सब कुछ जानते-बूझते हुए सत्ता ने कई स्तरों पर सच्चाई को ढकने की कोशिश की। अब इसी “छिपाने” को केंद्र में रखकर यह धड़ा चाहता है कि मामला दोबारा खुले, CBI जांच हो और प्रकरण जनता की अदालत से निकलकर न्याय की औपचारिक चौखट तक पहुंचे। असल उद्देश्य न्याय से ज़्यादा सत्ता संतुलन को बदलना है ताकि नेतृत्व परिवर्तन की जमीन तैयार हो सके और मुख्यमंत्री पद पर दावा मजबूत किया जा सके। वह धडा यह भी जानता हैं कि यदि cbi जांच हो तो पुष्कर धामी, महेंद्र भट्ट, गौतम, राठौर, रेनू विष्ट, सही जितने भी आरोपी जेल में बंद हैं सब के सब नपे जाएंगे और यही वो चाहते हैं।

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इस पूरे घटनाक्रम में कांग्रेस की भूमिका हड़बड़ी और तैयारीहीन दिखती है। कांग्रेस इस मुद्दे से अनभिज्ञ नहीं थी, लेकिन जिस संगठित ढंग से यह प्रकरण उछाला गया, उसके पीछे की स्क्रिप्ट कांग्रेस ने नहीं लिखी। बिना स्पष्ट रणनीति के कांग्रेस का मैदान में कूदना, बीजेपी के उस धड़े के लिए फायदेमंद साबित हो रहा है जो पहले से होमवर्क करके आया है। नतीजतन, कांग्रेस इस लड़ाई में फ्रंट फेस बनती दिख रही है, जबकि असली खिलाड़ी पर्दे के पीछे हैं।

मामले को जातीय रंग देना भी इसी अंदरूनी खेल का हिस्सा है। यह कोई संयोग नहीं कि जाति कार्ड उछालने वालों का उद्देश्य समाज में न्याय की बहस नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर अपनी स्थिति सुरक्षित करना है। गौर करने वाली बात यह है कि जिस दूसरे धड़े की बात हो रही है, उसमें न दलित प्रतिनिधित्व है और न पंडित वर्ग वह मूलतः सवर्ण-ठाकुर केंद्रित शक्ति संरचना है। जातीय विमर्श का शोर इसलिए खड़ा किया जा रहा है ताकि पार्टी के भीतर उन्हें दबाया न जा सके और जनमत को भावनात्मक दिशा दी जा सके। भट्ट और गौतम जैसे चेहरे जनता के सामने जो दिखा रहे हैं, वह सामाजिक सरोकार कम और पार्टी के भीतर चल रही लड़ाई का विस्तार अधिक है।

बीजेपी आज केवल विपक्ष से नहीं, बल्कि अपने ही भीतर से उठ रही असहजता से जूझ रही है। कांग्रेस से बीजेपी में आए कई नेता स्वयं को हाशिए पर महसूस कर रहे हैं न उन्हें संगठन में मान-सम्मान मिला, न निर्णय प्रक्रिया में हिस्सेदारी। यही असंतोष भीतर ही भीतर दरारें पैदा कर रहा है और यह भीतरी फूट अब सार्वजनिक मुद्दों के सहारे बाहर आ रही है। सत्ता परिवर्तन की चाह सिर्फ विपक्ष तक सीमित नहीं रही; बीजेपी का एक धड़ा भी उत्तराखण्ड में नेतृत्व परिवर्तन चाहता है।

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कुल मिलाकर, अंकिता भंडारी हत्या कांड आज न्याय से ज़्यादा सत्ता की शतरंज पर चली जा रही चालों का मोहरा बन चुका है। बीजेपी अपने ही बुने जाल में फंसती दिख रही है जहां जातिगत कार्ड, CBI की मांग, नैतिकता की दुहाई और जनभावनाओं का दोहन, सब कुछ एक बड़े राजनीतिक उद्देश्य के लिए इस्तेमाल हो रहा है। ऐसे में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के लिए इस अंदरूनी संगठनात्मक संकट से पार पाना आसान नहीं होगा। सवाल यह है कि इस सत्ता संघर्ष में न्याय की आवाज़ कहीं फिर से दब तो नहीं जाएगी और यही इस पूरे खेल की सबसे बड़ी विडंबना है।