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जब उत्तर-पूर्व भारत एक झंडे के नीचे आ सकता है, तो उत्तराखण्ड क्यों नहीं?

देवेश आदमी

भारत का उत्तर-पूर्व आज भारतीय राजनीति का सबसे दिलचस्प प्रयोग बनता जा रहा है। अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, नागालैंड और त्रिपुरा इन सभी राज्यों में अलग-अलग इतिहास, जातीय संरचना, भाषा, संस्कृति और संघर्षों के बावजूद “वन स्टेट–वन पार्टी” जैसे साझा राजनीतिक ढांचे पर गंभीर काम चल रहा है। यदि किसी राष्ट्रीय पार्टी के बहकावे में जाँसे या षड्यंत्र में यह न आये तो एक बेहतरीन बिकल्प उभर रहा हैं। उत्तर-पूर्व की क्षेत्रीय राजनीति ने यह मान लिया है कि बिखराव उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है और एकजुटता ही उनकी सबसे बड़ी ताकत बन सकती है। यह इस लिए कि उत्तर पूर्व ने हालिया वर्षो में बड़े गृहयुद्ध झेले हैं और केंद्र ने उन्हें उन के हाल पर छोड़ दिया था। उत्तर पूर्व के लोगों संग अन्य राज्यों में होता भेदभाव भी इस का कारण हैं।

जानकारी के अनुसार उत्तर-पूर्व की क्षेत्रीय पार्टियाँ जैसे असम में AGP, मेघालय में NPP, नागालैंड में NDPP, मिज़ोरम में MNF, त्रिपुरा में TIPRA Motha, मणिपुर में NPP व क्षेत्रीय मोर्चे, अरुणाचल में पपा तीन दौर की बातचीत पूरी कर चुकी हैं और लगभग 80% सहमति बन चुकी है। शेष 20% मुद्दों को 2026 के अंत तक सुलझाने का लक्ष्य रखा गया है। यह प्रक्रिया न आसान है, न सस्ती, न तात्कालिक लेकिन वहाँ यह स्वीकार कर लिया गया है कि राज्य की अस्मिता, संसाधन और भविष्य पार्टी से बड़ा मुद्दा है। उत्तर-पूर्व में कुल मिलाकर करीब 42 पंजीकृत राजनीतिक दल हैं, इसके बावजूद वे एक छत, एक झंडा और एक एजेंडा पर आने को तैयार हैं क्योंकि उन्हें समझ आ गया है कि दिल्ली की राजनीति से अपनी शर्तों पर बात तभी होगी जब वे एक स्वर में बोलेंगे।

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यही सवाल उत्तराखण्ड के संदर्भ में सबसे तीखा बनता है जो काम छह-सात राज्य मिलकर कर रहे हैं, वह काम उत्तराखण्ड अकेला क्यों नहीं कर सकता? यहाँ तो केवल एक राज्य है, 70 विधानसभा सीटें हैं और क्षेत्रीय राजनीति का दायरा सीमित है। उत्तर पूर्व भारत. में भाषा भौगोलिक दूरी जातीय. समीकरण जैसे जटिल मुद्दे हैं। हकीकत यह है कि उत्तराखण्ड की चार-पाँच प्रमुख क्षेत्रीय पार्टियाँ उत्तराखण्ड क्रांति दल (UKD), उत्तराखण्ड स्वाभिमान मोर्चा, उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी, उत्तराखण्ड जन एकता पार्टी, विभिन्न स्थानीय मोर्चे व निर्दलीय समूह अगर पूरी ताकत से भी चुनाव लड़ें, तो 50 विश्वसनीय उम्मीदवार भी खड़े करना कठिन हो जाता है। इसके बावजूद साझा मोर्चे, साझा पार्टी या साझा एजेंडा पर सहमति नहीं बन पा रही। सभी पार्टियों के कोषागार खाली पड़े हैं ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन का खर्च निकालना ukd के लिए कठिन हैं अन्य के पास तो न ऑफिस हैं न 12 सक्रिय सदस्य। ऐसे भी राजनीतिक पार्टियां हैं जिन का रजिस्ट्रेशन जिस पते पर हुआ वह अनेकों बार बिक गया हैं।

कारण स्पष्ट हैं, लेकिन स्वीकार नहीं किए जाते। पहला कारण है नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा हर छोटा नेता खुद को मुख्यमंत्री के संभावित चेहरे के रूप में देखता है, भले उसकी पार्टी दो सीटों से आगे सोचने की स्थिति में न हो। दूसरा कारण है आपसी वर्चस्व की लड़ाई कौन अध्यक्ष होगा, किसका झंडा होगा, किसका नाम आगे रहेगा; विचार और नीति बाद में आते हैं। तीसरा कारण है विजन का अभाव उत्तराखण्ड की अधिकांश क्षेत्रीय पार्टियों के पास न 20 साल का रोडमैप है, न स्पष्ट वैचारिक दिशा; वे केवल भाजपा-कांग्रेस विरोध तक सीमित हैं। चौथा कारण है स्पष्ट बायलॉज और आंतरिक लोकतंत्र का न होना किसी भी पार्टी में यह तय नहीं है कि मतभेद कैसे सुलझेंगे, नेतृत्व कैसे बदलेगा, निर्णय प्रक्रिया क्या होगी। पाँचवाँ और सबसे गंभीर कारण है कोई सूत्रधार न होना उत्तर-पूर्व में चर्च, छात्र संगठन, जनजातीय परिषदें और बुद्धिजीवी वर्ग मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं; उत्तराखण्ड में ऐसा कोई स्वीकार्य नैतिक या वैचारिक केंद्र मौजूद नहीं है।

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इसके साथ एक और समस्या जुड़ी है अनियंत्रित “समाज की पार्टियाँ”। हर जाति, हर क्षेत्र, हर आंदोलन के बाद एक नई पार्टी बन जाती है, जिसका उद्देश्य सत्ता नहीं बल्कि सौदेबाज़ी होता है। ये पार्टियाँ चुनाव से पहले दबाव बनाती हैं और बाद में या तो गायब हो जाती हैं या किसी राष्ट्रीय दल में समा जाती हैं। इससे क्षेत्रीय राजनीति का भरोसा लगातार कमजोर होता गया है। ऊपर से, देहरादून-केंद्रित राजनीति ने पहाड़ और मैदान के बीच दूरी और बढ़ा दी है; अधिकांश क्षेत्रीय दल जमीनी संगठन बनाने के बजाय प्रेस वार्ता और सोशल मीडिया तक सिमट गए हैं।

इसके विपरीत उत्तर-पूर्व ने यह समझ लिया है कि एकजुटता कोई भावनात्मक नारा नहीं, बल्कि संस्थागत प्रक्रिया है जिसमें समय, पैसा, धैर्य और त्याग लगता है। वहाँ यह स्वीकार किया गया है कि सब कुछ एक साथ नहीं मिलेगा, लेकिन कुछ साझा मिलेगा संसाधनों पर अधिकार, सांस्कृतिक सम्मान और राजनीतिक सौदेबाज़ी की ताकत। उत्तराखण्ड में समस्या यह नहीं है कि एकता संभव नहीं है; समस्या यह है कि एकता से पहले अहंकार को छोड़ने की तैयारी नहीं है।

इस का निष्कर्ष साफ है उत्तर-पूर्व अगर विविधता, संघर्ष और अस्थिरता के बावजूद एक साझा राजनीतिक छत बना सकता है, तो उत्तराखण्ड का असफल होना किसी भौगोलिक या राजनीतिक मजबूरी का परिणाम नहीं, बल्कि नेतृत्व की संकीर्णता और दृष्टिहीनता का नतीजा है। जब तक उत्तराखण्ड की क्षेत्रीय राजनीति व्यक्ति-केंद्रित, पद-केंद्रित और देहरादून-केंद्रित रहेगी, तब तक “एक झंडा, एक एजेंडा” केवल लेखों और बहसों का विषय बना रहेगा। उत्तर-पूर्व ने रास्ता दिखा दिया है अब सवाल यह नहीं कि हो सकता है या नहीं, सवाल यह है कि क्या उत्तराखण्ड के नेता इसके लिए तैयार हैं?
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