हिन्दी की मिठास, हिन्दी दिवस पर ही क्यों याद आती है?

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मोहम्मद इरफान
देखते ही देखते हिंदी दिवस का आधा पखवाड़ा बीत गया। भारत में समाज के बहुसंख्यक लोग हिंदी भाषी हैं, इसके बावजूद वो अंग्रेजी बोलना अपने ज्ञान की कुशलता के साथ आधुनिक होने का भी परिचय देते हैं। हिंदी भाषी और हिंदी पाठक को किसी न किसी रूप में पिछड़े होने के तौर पर देखा जाता रहा है। यह बात अलग है कि भारतीय समाज की बहुसंख्यक आबादी हिंदी में ही व्यवहार करती है।
अंग्रेजी के प्रति इस बढ़ते रुझान ने हमारी मानसिकता को इस कदर प्रभावित किया है कि हम भाषा को ज्ञान का माध्यम मानने के बजाय उसे प्रतिष्ठा और योग्यता का पैमाना मान बैठे हैं। कार्यालयों, उच्च शिक्षण संस्थानों और सार्वजनिक मंचों पर हिंदी बोलने वालों को अक्सर झिझक का सामना करना पड़ता है। जब तक हम अपनी मातृभाषा में सोचने, सीखने और अभिव्यक्ति करने पर गर्व महसूस नहीं करेंगे, तब तक यह स्थिति नहीं बदलेगी। आवश्यकता इस बात की है कि हिंदी को केवल भावनात्मक स्तर पर ही नहीं, बल्कि रोजगार, तकनीक और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से जोड़कर सशक्त बनाया जाए ताकि समाज में इसे सही सम्मान मिल सके।
आज के दौर में सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम हिंदी भाषा का उत्सव तो धूमधाम से मनाते हैं, लेकिन व्यवहार में इसे अपनाने से कतराते हैं। बाजार और बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भले ही अपने व्यवसाय का विस्तार करने के लिए हिंदी को अपनाया है, परंतु समाज में अब भी अंग्रेजी जानने वाले को ही अधिक सक्षम और बुद्धिमान स्वीकार किया जाता है। प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं तक, अध्ययन सामग्री का मुख्य झुकाव अंग्रेजी की ओर ही दिखाई देता है। इससे हिंदी माध्यम से पढ़े युवाओं में अनजाने में ही एक हीनभावना पनपने लगती है, जो उनके सर्वांगीण विकास में बाधक बनती है।
यदि हम चाहते हैं कि हिंदी भाषी और पाठक समाज में सीना तानकर खड़े हो सकें, तो हमें भाषा के प्रति अपना नजरिया बदलना होगा। सरकार और प्रशासनिक स्तर पर तो हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के प्रयास चल रहे हैं, लेकिन जब तक आम जनता और युवा वर्ग अपनी भाषा को अपनाने में हिचकिचाएगा, तब तक वास्तविक बदलाव संभव नहीं है। प्रशासनिक कार्यों, अदालत के फैसलों, तकनीकी शिक्षा और रोजगार के क्षेत्रों में हिंदी को मुख्यधारा से जोड़ना अति आवश्यक है। जब तक मातृभाषा को आजीविका और सम्मान की भाषा नहीं बनाया जाएगा, तब तक हिंदी दिवस के पखवाड़े केवल रस्म अदायगी बनकर ही रह जाएंगे। अपनी जड़ों से जुड़कर ही कोई समाज वास्तव में सशक्त और आत्मनिर्भर बन सकता है।
