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शवों की दुर्गति पर सोशल मीडिया में जंगल की आग की तरह फैली ‘शववाहिनी गंगा’

भारत के इतिहास मे शायद ही ऐसा व्यवहार मनुष्य के शरीर के साथ किया गया हो। उत्तर प्रदेश कि सरकार कह रही है कि व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त है। उसके लिए अदालत के कहे वो दो शब्द ही काफी हैं। पहला- ये नरसंहार है और दूसरा- चिकित्सा व्यवस्था राम भरोसे है। हमारी सरकारें सचाई से परे हैं, अगर यकीन नहीं होता तो पढ़िये इस गुजराती कवियत्री पारुल खाखर की कविता का हिंदी अनुवाद। मगर पहले ये वेदना, ये दर्द महसूस करने की ताकत जरूर रखिएगा —-

शव-वाहिनी गंगा —

एक साथ सब मुर्दे बोले ‘सब कुछ चंगा-चंगा’
साहेब तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा
ख़त्म हुए शमशान तुम्हारे, ख़त्म काष्ठ की बोरी
थके हमारे कंधे सारे, आँखें रह गई कोरी
दर-दर जाकर यमदूत खेले
मौत का नाच बेढंगा
साहेब तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा
नित लगातार जलती चिताएँ
राहत माँगे पलभर
नित लगातार टूटे चूड़ियाँ
कुटती छाती घर घर
देख लपटों को डफली बजाते वाह रे ‘बिल्ला-रंगा’
साहेब तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा
साहेब तुम्हारे दिव्य वस्त्र, दैदीप्य तुम्हारी ज्योति
काश असलियत लोग समझते, हो तुम पत्थर, ना मोती
हो हिम्मत तो आके बोलो
‘मेरा साहेब नंगा’
साहेब तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा!

कफन में लिपटी लासे, अधजली, क्षत-विक्षत, जानवरों की मौजूदगी, शवों की दुर्गति। आजाद भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा देखने को मिला है । गंगा के किनारे कन्नौज, उन्नाव , कानपुर, बनारस, प्रयागराज, गाजीपुर,बलिया। एक छोर से दूसरे छोर लासे ही लासे इन्साफ मांग रही है। सरकार की स्वास्थ्य व्यवस्था ध्वस्त है। सरकारों ने बोलने व कुछ लिखने पर पाबंदी लगाई है। सच को उजागर करने वाले पत्रकारों पर हमले हो रहे हैं। देश मे जीवन पर संकट है, इलाज मिल नहीं रहा है। मृत्यु के बाद चिता नसीब नहीं है। कई जगहों पर गंगा किनारे कदम-कदम पर शव हैं। ऐसा लगता है मानो गंगा में लाशों की बाढ़ आ गई है।

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11 मई वह दिन है जब प्रसिद्ध कवयित्री पारुल खाखर ने अपने फेसबुक पेज पर एक कविता, शववाहिनी गंगा पोस्ट की। सोशल मीडिया पर जंगल की आग की तरह फैल गया। नरेंद्र मोदी के प्रधान मंत्री बनने के बाद शायद यह पहली बार है कि उनकी मातृभाषा गुजराती में लिखी गई एक कविता ने न केवल सरकार की आलोचना की है, बल्कि आम आदमी की पीड़ा को भी आवाज दी है कि कैसे दूसरी कोरोनोवायरस लहर ने हमें तबाह कर दिया है। 11 मई वह दिन है जब प्रसिद्ध गुजराती कवि पारुल खाखर ने अपने फेसबुक पेज पर एक कविता, शववाहिनी गंगा पोस्ट की। यह सोशल मीडिया पर जंगल की आग की तरह फैल गया। गुजराती साहित्यकार स्तब्ध रह गए थे, वे नहीं जानते थे कि इस पर कैसे प्रतिक्रिया दी जाए। लेकिन आम गुजराती, जिनमें से कई का साहित्य से कोई लेना-देना नहीं है, ने इसे अपनी भावनाओं को आकर्षक और प्रतिध्वनित पाया। उन्होंने इसे खूब शेयर किया। एक या दो दिनों के भीतर, कविता का अंग्रेजी, हिंदी, मराठी और कुछ अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो गया। इतनी शक्तिशाली और बहादुर कविता लिखने के लिए खाखर की प्रशंसा की गई, लेकिन ट्रोल सेनाओं के अपमानजनक संदेशों की बौछार भी की गई। 51 वर्षीया खाखर अपनी रोमांटिक कविता के लिए जानी जाती हैं। राजनीतिक मुद्दे कुछ ऐसे नहीं हैं जिन्हें उन्होंने पहले छुआ था। लेकिन दूसरी कोविड लहर के कुप्रबंधन और सरकार की विनाशकारी विफलता के कारण उसके आसपास की तबाही ने उसे अंदर से पूरी तरह से झकझोर कर रख दिया। यही कारण है कि उन्हें ऐसी राजनीतिक और क्रांतिकारी कविता लिखने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसे अपलोड करने के बाद उन्हें इतना भारी ट्रोल किया गया है कि उन्हें अपना फेसबुक प्रोफाइल लॉक करना पड़ा है। सोशल मीडिया से अपनी कविता के लिए कहती हैं “जब मैंने कुछ भी गलत नहीं कहा तो मैं क्यों हटाऊं।” ।

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इस पर यह तर्क देना गलत नहीं होगा कि भारत एक निर्वाचित सरकार द्वारा स्वतंत्र भाषण और जवाबदेही पर एक अभूतपूर्व हमला देख रहा है, जब जनता की निगाह कहीं और है। एक ऐसे देश में जहां प्रधान मंत्री अपनी प्रजा को यह याद दिलाने के लिए हर अवसर का लाभ उठाने के लिए जाने जाते हैं कि अधिकारों और कर्तव्यों को अलग-अलग देखने की जरूरत नहीं है, संभव है कि भारत एक सक्रिय लोकतांत्रिक तंत्र के साथ महामारी से उभरेगा।

भारतीय सविधान का अनुच्छेत्र -21 कहता है कि किसी भी व्यक्ति को विधिद्वारा स्थापित प्रक्रिया के अतिरिक्त उससे जीबन और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है। इसी मामले में सुपीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अनुच्छे-21 के अन्तर्गत जीवन का अर्थ मात्र एक जीव के अस्तित्व से कहीं अधिक है। मानवीय गरिमा के साथ जीना व वे सब पहलु जो जीवन को अर्थपूर्ण, पूर्ण और जीने योग्य बनाते है इसमें शामिल है।

®️ राजकुमार सिंह