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कल्याण सिंह को क्यों याद करें

कल्याण सिंह का मतकब शिक्षा चिकित्सा व धर्म के पुरोधा। वह दौर उत्तरप्रदेश के लिए स्वर्णिम यिग की तरह था। आज का उत्तराखण्ड तब का उत्तरप्रदेश शिक्षा के मामले में नए आयाम लिख रहा था। भले हम लखनऊ राजधानी से 430km दूर थे बावजूद इस के पहाड़ों पर लखनऊ से पैनी नजर होती थी। इस के लिए कल्याण सिंह व राजनाथ सिंह के हम पहाड़ी बहुत आभारी हैं। इन दोनों जननायकों में कुछ समानताएं थी दोनों शिक्षक थे और लम्बे समय से RSS से जुड़े रहे। BJP के सूत्रधार भी रहे तो उत्तरप्रदेश को संजोने में जीवन खपा दिया। वह दौर बड़े-बड़े जनांदोलनों का रहा जिस में उत्तराखण्ड पृथक राज्य व रामन्दिर बाबरी मस्जिद विवाद सब से अहम हैं। पूर्वी उत्तरप्रदेश का गुंडा राज नक्षलवाद तराई में भुखमरी महामारी व पहाड़ मूलभूत सुविधाओं से जूझ रहा था। बावजूद इस के 89% शिक्षा चिकित्सा राजस्व व PWD विभाग के पदों पर कर्मचारी कार्यरत थे। कल्याण सिंह को लोग राम मंदिर से जोड़ कर देखते हैं वह उन का सब से साहसिक कदम था पर इस के लिए वे अनेकों इंटरव्यू में कह चुके हैं कि इस का उन्हें पछतावा रहा। किंतु यह सब दौर में संभव था आज नही। किसी भी एतिहासिक धार्मिक स्थल को गिराना आज असंभव हैं।

कल्याण सिंह रावत जब उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री थे उन्होंने शिक्षा पर बहुत अधिक कार्य किया। शिक्षा नीतियों में बदलाव शिक्षा हर जरूरतमंद तक पहुचे। पाठ्यक्रम कम हो उपियोगिता अधिक हो छात्रवृत्ति प्रोडशिक्षा भवनों का निर्माण शिक्षा के ढांचे में नीतिगत सुधार सम्बंधी अनेकों कार्य कल्याण सिंह रावत के मुख्यमंत्री कार्यकाल में हुए। चिकित्सा के क्षेत्र में उन के द्वारा बहुत लाभकारी योजना चलाई गई थी। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति 3 हजार की आवादी पर एक चिकित्सा केन्द्र या प्रति 7km पर स्थित हो। जच्चा बच्चा केन्द्र अलग से स्थापित हो। ग्रामीण क्षेत्रों में phc व chc में प्राथमिक चिकित्सा की सभी सुविधाएं उपलब्ध हो। उत्तरप्रदेश के वे विजय, पराजय व पुनरुत्थान के सूत्रधार, रहे कठोर प्रशासक मगर दिल के उतने ही नरम रहे कल्याण सिंह
कल्याण सिंह… कहते थे दिल की राजनीति करता हूं, दिमाग की नहीं। कई बार भाजपा से अलग हुए तो माफी मांगकर लौटने में भी संकोच नहीं किया। हालांकि जब-जब भाजपा से दूर हुए, पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा। तारीख 21 जनवरी 2009। लखनऊ स्थित माल एवेन्यू का 2 नंबर बंगला। कल्याण सिंह बोल रहे थे, ‘भाजपा में वापस जाना मेरी भारी भूल थी। मुझे इस पर भारी पश्चाताप है। मुझे राम मंदिर पर अपनी भूमिका के लिए अफसोस है। इस बार मैंने हमेशा-हमेशा के लिए भाजपा से नाता तोड़ दिया है। अब इस जन्म तो क्या, सात जन्मों तक भाजपा में नहीं जाऊंगा। मेरी लाश भी वहां नहीं जाएगी। मैंने जिन हाथों से भाजपा को बनाया है, उन्हीं हाथों से उसे जमीन में गहरा गड्ढा खोदकर दफन कर दूंगा।’

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ये वही कल्याण सिंह थे जो भाजपा के संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे… जिन्होंने प्रदेश भाजपा को बनाया ही नहीं, बल्कि बढ़ाने में पूरी ताकत लगाई… जो भाजपा व हिंदुत्व की राजनीति के पर्याय माने जाते थे… जिन्होंने 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में ढांचा ध्वंस के बाद राज्यपाल को त्यागपत्र सौंपने के बाद कहा था, उस जीर्ण-शीर्ण इमारत को बचाने के लिए मैं कारसेवकों पर गोली नहीं चलवा सकता था। मुझे ढांचा ढह जाने पर कोई अफसोस नहीं है। जहां तक सरकार का सवाल है, तो एक क्या सैकड़ों सरकारें राममंदिर पर न्योछावर हैं। आज देश ने ऐसी देह खोई है जो संजोने के लायक थी आज देश ने एक ऐसा अनुसंधान खोया हैं जो नहोते हुए भी युगों-युगों तक शिक्षा प्रदान करेगा।

आज उन की देह अंतिम यात्रा के लिए तैयार हो रही हैं वे आज वैकुण्ठ सिधार चुके हैं किंतु उन के दिखाए ज्योति से पहाड़ सदैव रोशन रहेगा। भगवान उन की यात्रा को सफल करे व उन्हें अपने चरणों में स्थान दें। ॐ शांति

देवेश आदमी