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संस्कृत: वह एकमात्र भाषा जो आज भी प्रयोग में है

संस्कृत भाषा गायब नहीं हुई है। भारत में जैसे जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय और दुनिया भर के कई शोध संस्थानों में विशेषज्ञ संस्कृत भाषा का अनुसंधान कर रहे हैं। देश या कहें विदेशों के कई मंदिरों में आज भी भिक्षु व भिक्षुणी प्रतिदिन संस्कृत में शास्त्रों का पाठ करते हैं। संस्कृत का अभी भी दुनिया में अपने अद्वितीय सांस्कृतिक मूल्य के साथ उपयोग किया जा रहा है, और यह निश्चित रूप से भविष्य में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रहेगी।

भारत में सबसे पुराने ग्रंथ, जैसे “वेद”, संस्कृत भाषा से बने हैं, और उनमें उपमहाद्वीप की कुछ प्राचीन भाषाओं जैसे तमिल के तत्व भी शामिल हैं। भारत में कुछ मंदिरों और यहां तक कि दूरदराज के कुछ इलाकों में अभी भी संस्कृत का प्रयोग किया जाता है। प्राचीन भारत में लगभग सभी महत्वपूर्ण ग्रंथ संस्कृत में लिखे गए थे, जिसने बहुत सारे नाटक, दर्शन, वास्तुकला, योग, पौराणिक कथाओं आदि की भी जन्म हुई थी। शास्त्रीय संस्कृत में बड़ी संख्या में धार्मिक, दार्शनिक, साहित्यिक, वैज्ञानिक, राजनीतिक, कानूनी और कलात्मक रचनाएँ भी लिखी गईं थीं। सौभाग्यवश, वे सभी हजारों वर्षों के ऐतिहासिक परिवर्तनों से बचे हैं।

           

हालाँकि, संस्कृत एक मौखिक भाषा नहीं बन पाई। यहां तक कि पंडित भी शायद संस्कृत का इस्तेमाल केवल औपचारिक उद्देश्यों के लिए करता था। इस संबंध में, संस्कृत भाषा प्राचीन काल की चीनी भाषा के समान है। अर्थात्, यद्यपि लोग इसे लिखित रूप में उपयोग करते थे, पर बातचीत में दूसरी बोली भाषा का इस्तेमाल करते थे। संस्कृत अब आमतौर पर केवल धार्मिक समारोहों में और जन्म, विवाह, अंत्येष्टि और मंदिर की प्रार्थना जैसे अवसरों पर उपयोग की जाती है।

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संस्कृत का मूल्य कई सांस्कृतिक क्लासिक्स में परिलक्षित होता है, और दूसरी ओर, लोगों का मानना है कि संस्कृत के उपयोग से मस्तिष्क की शक्ति में सुधार हो सकता है, और संस्कृत का उपयोग करने वाले लोग भगवान के साथ आध्यात्मिक संचार प्राप्त कर सकते हैं। इसीलिए स्कूल के पाठ्यक्रम में संस्कृत को शामिल करना आवश्यक साबित है। संस्कृत विज्ञान, गणित, चिकित्सा और अंतरिक्ष से संबंधित ज्ञान में समृद्ध है। इसके अलावा, कई एशियाई देशों की भाषाओं में संस्कृत तत्व भी हैं, जो इतिहास और धार्मिक प्रसारण के परिणाम दोनों से संबंधित हैं।

        

संस्कृत भाषा ने हमारी संस्कृति, संस्कार, परम्पराओं और सभ्यताओं को सींच कर समृद्ध बनाया है। वैज्ञानिक भाषा होने के साथ संस्कृत विश्व की अनेक भाषाओं की जननी भी है। संस्कृत दिवस पर हम अपनी इस अमूल्य धरोहर को संरक्षित-संवर्धित करने के प्रति समर्पित हों। संस्कृत दिवस की शुभकामनाएं।

राजकुमार सिंह परिहार