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राष्ट्रवाद क्या सच में राष्ट्रवादी?, हिंदुत्ववाद क्या सच में हिंदुत्ववादी?

भारत में 2014 के बाद अगर किसी चीज का सबसे ज्यादा प्रचार प्रसार हुआ है तो वह है हिंदू राष्ट्रवाद का, इसी के साथ यह कहना भी गलत नहीं होगा कि हिंदुत्व का खुद को रक्षक बताकर भारतीय जनता पार्टी पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई। भाजपा की हर रणनीति में कहीं ना कहीं हिंदुत्व का एजेंडा हमेशा आगे रहा है परंतु सोचनीय विषय यह है की अपने को हिंदू धर्म का ध्वजवाहक समझने वाली भारतीय जनता पार्टी क्या वाकई में हिंदू धर्म की आस्थाओं और मान्यताओं के प्रति संवेदनशील है पिछले कुछ समय के घटनाक्रम मैं अगर नजर डाली जाए तो ऐसा प्रतीत नहीं होता देश की गाय जिनको प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी माता बोलते हैं की लंपी वायरस के कारण अत्यंत दयनीय स्थिति हो गई है कुछ आंकड़ों की माने तो लगभग 50,000 गायों की मृत्यु इस वायरस के चलते हो चुकी है इस दयनीय स्थिति में भी जो तमाम हिंदू संगठन जो खुद को गौ रक्षक बताते हैं कहीं नजर नहीं आते गाय के नाम पर राजनीति करने वाली भाजपा के कार्यकर्ता और सरकार दोनों ही जमीनी स्तर पर कुछ करते नजर नहीं आते हां यह जरूर है कि एक तरफ गायों की दुर्दशा हो रही है और गाय के नाम पर राजनीति करने वाले लोग चीता का महिमामंडन करने में लगे हुए हैं यह तो हुई गायों की स्थिति जिस को हिंदू धर्म में सर्वोच्च स्थान मिला हुआ है हिंदू धर्म में ही एक और समय का बहुत उच्च स्थान है और वह है पितृपक्ष का पितृ पक्ष में परिजन अपने पितरों के नाम तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म करते हैं. मान्यता है कि इससे पितर अति प्रसन्न होते हैं और परिजनों को आशीर्वाद प्रदान करते हैं. मोर को दाना देने से लेकर मां को खाना खिलाने तक मोदी जी फोटो खिंचवाते हुए नजर आते हैं मगर आज तक खुद को हिंदू हृदय सम्राट समझने वाले पिंडदान करते हुए किसी तस्वीर में नजर नहीं आए देश की जनता को समझना पड़ेगा की कौन जमीनी स्तर पर काम करता है और कौन सिर्फ फोटो खिंचवाने तक सीमित रहता है वरना वह दिन दूर नहीं जब देश का विकास सिर्फ फोटो में नजर आएगा और देश की जनता के हाथ में सिर्फ कटोरा होगा तब हमें शायद बचपन में पढ़ी हुई वह पंक्तियां जरूर याद आएंगी “अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत”।

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सत्यनवेशी