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हिंदी विभाग जामिया की प्रोफेसर इंदु वीरेंद्रा की पुस्तक “भारतीय आत्मकथाएं संघर्ष और चुनौतियां” पर हुई परिचर्चा

कार्यक्रम में पुस्तक पर अपनी बात रखने के लिए लेखिका प्रो. इंदु वीरेंद्रा, अध्यक्ष- प्रोफेसर अश्विनी कुमार, मुख्य वक्ता के तौर पर कुसुम लता सिंह, डॉ विभा ठाकुर, डॉक्टर मुकेश कुमार मिरोठा, वक्तागण के तौर पर बलबीर सिंह और ऋषिकेश कुमार शामिल रहें।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया के हिन्दी विभाग की प्रोफेसर और जवाहरलाल लाल नेहरु की डायरेक्टर प्रोफेसर इंदु वीरेंद्रा की पुस्तक “भारतीय आत्मकथाएं संघर्ष और चुनौतियां” पर परिचर्चा की गयी। वक्ता के रूप में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर, जामिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और ककसाड़ पत्रिका की संपादक भी शामिल रहीं. कार्यक्रम में कई विश्वविद्यालय के शोधार्थी और छात्र-छात्राएं भी उपस्थित रहें।

इस परिचर्चा में लेखिका प्रोफेसर इंदु वीरेंद्रा ने “भारतीय आत्मकथाएं संघर्ष और चुनौतियां” पुस्तक लिखने की प्रेरणा पर अपनी बात रखते हुए कहती है कि आत्मकथा लिखना बहुत ही कठिन और साहस का काम है. प्रत्येक व्यक्ति अपनी निजता को समाज के सामने नहीं रख पाता है। मेरे समक्ष जो आत्मकथाएं आयी, वह सभी अपने-अपने संघर्षों से लड़ते हुए दिखाई दिए। यही संघर्ष मुझे पुस्तक लिखने की प्रेरणा देता है। इस पुस्तक में मैंने 82 आत्मकथाओं का संक्षिप्त वर्णन किया है ।प्रोफेसर इंदु वीरेंद्रा ने आत्मकथाएं लिखने में आने वाली चुनौतियों का भी वर्णन किया। समाज में स्त्री और पुरुष दोनों ही अपने-अपने स्थान पर अलग-अलग मोर्चों पर संघर्ष करते हुए दिखाई देते हैं. जहां पुरुष अपने संघर्षों से दो-दो हाथ करता हुआ दिखाई देता है वही स्त्री अपने संघर्षों से विचलित होती हुई दिखाई देती है। इस पुस्तक में अनूदित आत्मकथाओं का भी वर्णन किया गया है। अनूदित आत्मकथाओं का वर्णन करने के लिए काफी मुश्किलों का भी सामना करना पड़ा है। लंबे जद्दोजहद के बाद मैं अपने शोध को पुस्तक रूप में ला पाई। आज पुस्तक आपके समक्ष है, पुस्तक पर आप सभी के विचार आमंत्रित है।

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कार्यक्रम में ककसाड़ पत्रिका की संपादक कुसुम लता सिंह ने कहा कि स्त्री लेखकों ने शुरू से ही पुरुष प्रधान समाज में स्त्री के वजूद को लेकर संघर्ष किया है और अपनी कलम की धार से स्त्रियों के हक़ की बात कही है। इस पुस्तक में देश की सभी भाषाओं की महिला लेखकों की आत्मकथा है। ये आत्मकथाएं हमारे पूर्वजों का दस्तावेज है, जिन्होंने जाति-धर्म से लेकर नारी होने का दंश झेला है. यह पुस्तक उन सभी संघर्षों को हमारे सामने प्रस्तुत करती है।

डीयू के कालिन्दी कॉलेज की सहायक प्रोफेसर डॉ विभा ठाकुर ने पुस्तक पर चर्चा करते हुए कहा कि हिन्दी से लेकर अन्य भारतीय भाषाओँ में कितनी आत्मकथाएं लिखी गयी हैं। उन सबका दस्तावेज हमें इस एक किताब में मिलता है। हिन्दी के अलावा अन्य भाषाओं के आत्मकथा को लिखना बहुत ही कठिन होता है. मगर प्रोफेसर वीरेंद्रा ने इस कठिन कार्य को भी अपनी मेहनत से पूरा किया है. डॉ विभा कहती हैं कि पुरुषों ने भी अपने जीवन में संघर्ष किया है। मगर उनका संघर्ष सामाजिक तौर पर ही रहा है। जबकि महिलाओं का संघर्ष सामाजिक, पारिवारिक और निजी तौर पर रहा है। उन्होंने कहा कि जिसके जीवन में संघर्ष होता है वही संघर्षो की गाथा लिखता है।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया के एसोसिएट प्रोफसर डॉ मुकेश कुमार मिरोठा ने कहा कि एक ही पुस्तक में सभी आत्मकथाओं को समेटना बहुत ही कठिन कार्य है. मगर उस कठिन कार्य को पूरा किया है प्रोफेसर इंदु वीरेंद्रा ने जो कि हम सभी के लिए एक सीख है. इन्होंने जिस तरह से हिन्दी भाषी लेखकों के अलावा गुजराती, मलयालम, पंजाबी और अन्य भारतीय भाषाओं के लेखिकाओं की आत्मकथा और उनकी संघर्षों को अपनी पुस्तक में बयान किया है। वो काबिले-तारीफ है. इस पुस्तक की सबसे खास बात है कि इसमें सभी धर्म और जाति की महिलाओं की आत्मकथाओं को शामिल किया गया है। डॉ मुकेश कुमार ने कहा कि अकादमिक से जुड़े हुए लोग और शोध के छात्रों के लिए यह पुस्तक बहुत ही उपयोगी है।

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डीयू के मोती लाल नेहरु कॉलेज के प्रोफेसर अश्वनी कुमार ने पुस्तक पर चर्चा करते हुए कहा कि भारतीय आत्मकथाएं संघर्ष और चुनौतियां बहुत ही महत्वपूर्ण पुस्तक है इस पुस्तक के लिए मैं लेखिका को बहुत-बहुत बधाई देता हूं। इस पुस्तक को तैयार करना आसान नहीं था, यकीनन इस पुस्तक को तैयार करने में लेखिका को कई वर्ष लग गए होंगे। यह पुस्तक शोध आधारित है। इस पुस्तक को लिखने के लिए काफी शोध की जरूरत पड़ी होगी, जो की लेखिका ने की भी है। यह एक ज्ञानवर्धक पुस्तक है, शोधार्थियों के लिए तो काफी उपयोगी है उन्हें एक साथ 82 आत्मकथाओं के बारे में जानने का मौका मिलेगा। साथ ही इस पर और भी कार्य करने के लिए लोगों को मार्गदर्शन मिलेगा। इसमें कोई दो राय नहीं है कि स्त्रियों के संघर्ष और चुनौतियां समाज में सबसे ज्यादा होती है। इस पुस्तक में स्त्री आत्मकथाओं पर विशेष रूप से जोर दिया गया है।

डीयू के पीजीडीएवी कॉलेज के सहायक प्रोफेसर डॉ ऋषि कुमार ने कहा कि मैं तो खुद प्रोफेसर वीरेंद्रा मैम के अन्दर में शोध कार्य पूरा किया हूँ। मुझे इनके पुस्तक पर बोलना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। भारतीय आत्मकथाएं संघर्ष और चुनौतियाँ यह सिर्फ पुस्तक नहीं एक बहुत बड़ा दस्तावेज है जो शोधार्थियों के लिए बहुत ही लाभदायक होगा।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया के शोधार्थी बलबीर सिंह ने कहा कि मैम ने इस पुस्तक के जरिए सभी साहित्यकारों को एक दस्तावेज में समटने की कोशिश की हैं, जो भविष्य के शोधार्थियों के लिए बहुत ही उपयोगी होगा।

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कार्यक्रम का संचालन डीयू के मोतीलाल कॉलेज की सहायक प्रोफेसर मीनू कुमारी ने किया व धन्यवाद ज्ञापन जामिया मिल्लिया इस्लामिया की शोधार्थी लक्ष्मी सोलंकी ने किया।