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अंकिता भंडारी हत्याकांड:-

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देवेश आदमी

  • न्याय नहीं मिला तो कानून पर से जनता का विश्वास टूट जाएगा..
  • मुख्यमंत्री को चाहिए कि निष्पक्ष जांच हेतु cbi को पत्र लिखें..
  • यदि जनता का न्याय पालिका कार्य पालिका पर विश्वास बरकरार रखना हैं तो दूध से पानी हटाने का कार्य सरकार करे…

अंकिता भंडारी हत्याकांड एक बार फिर ऐसे मोड़ पर आ खड़ा हुआ है, जहाँ यह मामला केवल एक जघन्य हत्या नहीं रहा, बल्कि उत्तराखंड की सत्ता, शासन और न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता की कसौटी बन चुका है। हालिया घटनाक्रमों ने इस प्रकरण में कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनके घेरे में धामी सरकार, उसके मंत्री, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और सत्ता से जुड़े प्रभावशाली लोग आते दिख रहे हैं। ऐसे में अब यह सिर्फ अपराध की जांच का विषय नहीं, बल्कि जन-विश्वास को बचाने का प्रश्न बन गया है।

आज राज्य के भीतर और बाहर यह भावना गहराती जा रही है कि इस मामले में सच को दबाने की कोशिश हो रही है। यदि सरकार के लोग या सत्ता से जुड़े व्यक्ति संदेह के घेरे में हैं, तो राज्य पुलिस से निष्पक्ष जांच की अपेक्षा करना स्वयं में अव्यावहारिक हो जाता है। यही कारण है कि अब CBI जांच केवल एक मांग नहीं, बल्कि जन-आवश्यकता बन चुकी है। धामी जी को चाहिए कि वे पहल करते हुए स्वयं CBI को पत्र लिखें और इस जांच को केंद्र को सौंपें, ताकि यह संदेश जाए कि सरकार सच से डरती नहीं है। जनता को सरकार ने जिस कार्य हेतु चुना हैं सरकार की जिम्मेदारी बनती हैं कि वह अपने कार्तव्य का निर्वान करे। भेद राग द्वेष पार्टीवाद से ऊपर उठ कर इस विषय को cbi पटल पर लेकर जाए।

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यदि सरकार ऐसा नहीं करती, तो न्यायपालिका का हस्तक्षेप अनिवार्य हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में जनता के साथ खड़ा होना चाहिए, क्योंकि जब कार्यपालिका संदेह के घेरे में हो, तब न्यायपालिका ही लोकतंत्र की आखिरी उम्मीद होती है। यदि अदालतें भी चुप रहीं, तो इसका परिणाम केवल एक केस तक सीमित नहीं रहेगा लोगों का अदालत, कानून और सरकार से विश्वास उठ जाएगा। समाज को यदि एक दिशा दसा देनी हैं तो उन्हें कानून पर विश्वास होना जरुरी हैं और कानून का वे सम्मान करे। कानून का डर नहीं कानून उन के लिए तब तक सही हैं जब तक वे कानून के भीतर हैं जिस दिन उन्होंने कानून तोड़ा कानून उन्हें दंड देगा यह डर यह भाव उन्हें सदैक याद रहे।

इतिहास गवाह है कि जब जनता का कानून से भरोसा टूटता है, तो समाज में अराजकता फैलती है। आज उत्तराखंड में बढ़ते अपराध इसी भयावह दिशा की ओर इशारा कर रहे हैं। देहरादून में येंजल चकमा की नस्लवादी हत्या इसका ताजा उदाहरण है जहाँ आरोपियों को कानून का कोई डर नहीं दिखा। वन खनन, शराब तस्करी, बलात्कार, हत्या जैसे अपराध बढ़ते जा रहे हैं, क्योंकि अपराधियों को लगता है कि रसूख और सत्ता उन्हें बचा लेगी। पैसे के दम पर कानून तोड़ता नहीं बात नहीं रह जाएगी। हालांकि हम भी हो सकता हैं कि अंकिता भंडारी हत्या कांड में जो नया मोड़ नहीं बयान आई हैं सिर्फ अफवाह हो फिर भी सरकार को अपनी विश्वस्नीयता को बनाये रखने के लिए दूध में से पानी अलग करना ही होगा। यह सवाल अब एक लड़की के न्याय का नहीं रह गया हैं यह सवाल एक समाज एक भूभाग एक बड़े जन समूह के भविष्य का हो गया हैं।

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जब कानून कमजोर दिखता है, तो केवल बड़े अपराध नहीं बढ़ते, बल्कि घरेलू हिंसा जैसे अपराध भी सामान्य होने लगते हैं। लोगों को यह भरोसा नहीं रहता कि शिकायत करने पर न्याय मिलेगा। यही वातावरण रसूखदार अपराधियों को जन्म देता है, भ्रष्टाचार को संस्थागत करता है, और समाज को भीतर से खोखला कर देता है। यह भविष्य की सुरवात हैं यहीं से मालूम हो जायेगा कि पहाड़ों का भविष्य क्या होने वाला हैं।

इसलिए अंकिता भंडारी हत्याकांड में CBI जांच कोई राजनीतिक मांग नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक आवश्यकता है। यह एक राज्य को व्यवस्थित करने की पहल हो सकती हैं। न्याय यदि समय पर और निष्पक्ष नहीं मिला, तो यह सिर्फ अंकिता के साथ अन्याय नहीं होगा यह पूरे समाज के साथ अन्याय होगा। आगे से कोई भी अपराधी किसी की भी हत्या कर सकता हैं क्यों कि वह जानता हैं कि सरकार निष्क्रिय हैं। आज सरकार और न्यायपालिका के सामने विकल्प साफ़ है या तो जनता का भरोसा बचाया जाए, या फिर उसके टूटने के भयानक परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहा जाए।