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विकास का मार्ग :-

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देवेश आदमी

  • धर्म नहीं, ज्ञान,विज्ञान,तर्क के सहअस्तित्व से..
  • धर्म विज्ञान को और विज्ञान धर्म के अस्तित्व को नहीं नकार सकता..
  • वर्तमान दौर में धर्म और विज्ञान साथ चले तभी दुनिया का संरक्षण हैं..

जावेद अख्तर व मुफ़्ती जी की पूरी बहस मैंने लगभग नौ से दस बार देखी तब मैंने कुछ लिखने की हिमत की मैं अभी अपनी सोच को इतना विकसित नहीं कर सका कि मैं इतने संबेदनशील मुद्दे पर लिख सकू मेटफिजिक्स मैंने भी पढ़ी हैं मैंने अनेकों जगह अपने लेख में इस का जिक्र किया हैं मैंने अध्यात्म विज्ञान को एक कर के भी समझा हैं मगर यह बहस बहुत पारदर्शी थी इस का एक एक शब्द एक नया दौर लाएगा। इस संवाद से जो मैंने समझा जाना वह मैं लिख रहा हूँ।
देश और दुनिया का इतिहास यह साफ़ बताता है कि सभ्यताएँ धर्म के प्रदर्शन से नहीं, बल्कि ज्ञान, विज्ञान और तर्क से आगे बढ़ी हैं। जहाँ प्रश्न पूछने की आज़ादी रही, जहाँ प्रयोग, शोध और विवेक को सम्मान मिला, वहीं प्रगति, उन्नति और विकास संभव हुआ। यह कहना धर्म का निषेध नहीं है, बल्कि यह समझना है कि विकास का इंजन विज्ञान है और धर्म उसकी नैतिक दिशा हो सकता है यदि वह उन्माद नहीं, मानवता का पक्षधर हो।

भारत का उदाहरण स्वयं इसका सबसे ठोस प्रमाण है। 1947–48 के आसपास भारत में औसत आयु लगभग 35 वर्ष थी। आज यह बढ़कर 70–80 वर्ष के बीच पहुँच चुकी है। यह परिवर्तन किसी धार्मिक आयोजन, कर्मकांड या प्रदर्शन से नहीं आया, बल्कि चिकित्सा विज्ञान, टीकाकरण, स्वच्छता, पोषण, शिक्षा और शोध के विस्तार से संभव हुआ। जब हमने विज्ञान को अपनाया, ज्ञान अर्जन को प्राथमिकता दी, तभी समाज ने लंबी छलांग लगाई।

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हरित क्रांति ने भारत को भुखमरी से निकाला, श्वेत क्रांति ने पोषण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किया। IIT, IIM, AIIMS जैसे संस्थानों ने केवल डिग्रीधारी नहीं बनाए, बल्कि सोचने समझने वाले वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर और नीति-निर्माता तैयार किए। डैम, सिंचाई परियोजनाएँ, खाद्य भंडारण, सार्वजनिक वितरण प्रणाली ये सब तर्क, गणना और वैज्ञानिक योजना का परिणाम थे। प्रकृति को ताक पर रखकर नहीं, बल्कि कई जगह प्रकृति को समझकर विकास के प्रयास हुए।

यह भी उतना ही सच है कि धर्म पूरी तरह अनावश्यक नहीं है। धर्म समाज को नैतिक ढाँचा देता है, मनुष्य को संवेदना, करुणा और संयम का बोध कराता है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब धर्म मन से उतरकर प्रदर्शन बन जाता है जब वह फूहड़, उन्मादी और आक्रामक रूप ले लेता है। धर्म का स्थान आत्मा में है, सड़क पर शोर में नहीं। धर्म का अर्थ मानवता को आगे रखना है, न कि तर्क और प्रश्नों को कुचलना।

आज सबसे बड़ी ज़रूरत अध्ययन, अध्यापन और शोध पर लौटने की है। हमें विज्ञान और तकनीक में नए अनुसंधान चाहिए चिकित्सा, ऊर्जा, पर्यावरण, कृषि, भाषा, संस्कृति और प्रकृति के क्षेत्रों में। साथ ही एक गंभीर और ईमानदार प्रश्न भी उठाना होगा धर्म क्या है? धर्म के पीछे का विज्ञान क्या है? धर्म किस विज्ञान की शाखा है?

यदि हम गहराई से देखें तो पाएँगे कि कथा-वाचन, माला-जप, उपवास, ध्यान, योग इन सबके भीतर मनोविज्ञान, तंत्रिका विज्ञान, शरीर विज्ञान और सामाजिक विज्ञान छिपा है। ध्यान का संबंध मस्तिष्क की तरंगों से है, उपवास का संबंध मेटाबॉलिज़्म और कोशिका-नवीनीकरण से है, योग का संबंध श्वसन, मांसपेशियों और मानसिक संतुलन से है। इस छिपे हुए विज्ञान को अंधविश्वास की भाषा में नहीं, शोध और प्रमाण की भाषा में दुनिया के सामने रखना ज़रूरी है।

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यह भी उतना ही आवश्यक है कि हम समझें धर्म और विज्ञान मूलतः विरोधी नहीं हैं। टकराव तब होता है जब धर्म विज्ञान को ख़ारिज करता है और विज्ञान धर्म को केवल अंधविश्वास कहकर नकार देता है। विकास तभी संभव है जब धर्म अपने पीछे के विज्ञान को स्वीकार करे और विज्ञान धर्म की मानवीय, नैतिक चेतना को समझे।

एक-दूसरे के अस्तित्व को नकारना आसान है, समझना कठिन। लेकिन समझना ही विकास की शर्त है। जब हम धर्म के पीछे का विज्ञान और विज्ञान के पीछे का धर्म समझेंगे और उसे समाज को समझाएँगे तभी सच्चा, टिकाऊ और मानवीय विकास संभव होगा।