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जामिया के कुलपति प्रो. मज़हर आसिफ ने डॉ. रख़्शन्दा रूही मेहदी की पुस्तकों “अलखदास” और एक ख़्वाब जागती आँखों का किया विमोचन

डॉ ओबैदुल ओला

नई दिल्ली. जामिया मिलिया इस्लामिया के यासर अराफात हॉल में जामिया एलुमनाई अफेयर्स की ओर से प्रसिद्ध फिक्शन लेखिका और सैयद आबिद हुसैन सीनियर सेकेंडरी स्कूल की शिक्षिका डॉक्टर रख़्शन्दा रूही मेहदी की दो किताबों का विमोचन कुलपति प्रोफेसर मज़हर आसिफ दिसंबर के तीसरे सप्ताह में किया गया। पहली किताब “अलखदास” शेख अब्दुल कुद्दूस गंगोही (रह.) के हिंदी साहित्य में योगदान पर है और दूसरी किताब “एक ख्वाब जागती आँखों का…” हिंदी कहानियों का संग्रह है।

उक्त कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति महोदय ने की जबकि विशेष अतिथि के रूप में प्रोफेसर मेहताब आलम रिज़वी, रजिस्ट्रार, जामिया मिलिया इस्लामिया उपस्थित हुए। इस अवसर पर पूर्व अध्यक्ष, उर्दू विभाग तथा पूर्व डीन, फैकल्टी ऑफ ह्यूमैनिटीज एंड लैंग्वेजेज प्रोफेसर वहाजुद्दीन अलवी ने कहा कि सूफीवाद पर इस दौर में ऐसी व्यापक किताब लिखना किसी करिश्मे से कम नहीं है। सूफी अल्लाह से इश्क करता है और यही इश्क वह कायनात के हर कण में महसूस करता है। सूफी कभी किसी के दिल को ठेस नहीं पहुँचा सकता।

प्रोफेसर मेहताब आलम रिज़वी ने “अलखदास” किताब को वर्तमान दौर की महत्वपूर्ण किताब बताते हुए कहा कि सूफीवाद आपसी भाईचारे को बढ़ावा देता है। सूफी के आस्ताने पर सभी धर्मों और मिल्लतों के मानने वाले श्रद्धा से एकत्र होते हैं। इसी अर्थ में रख़्शन्दा रूही मेहदी की किताब महत्वपूर्ण है और इसे पढ़ा जाना चाहिए।

अध्यक्षीय भाषण में कुलपति, जामिया मिलिया इस्लामिया ने बहुत विचारपूर्ण और विस्तृत बातचीत की। उन्होंने “” नाम की सूफीवाद की रोशनी में व्याख्या की—कुरान की कई आयतों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि सूफी को अपने महबूब यानी खुदा से करीब होने का रास्ता दीन व ईमान और सच्चे इश्क के बिना संभव नहीं है।

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डीन एलुमनाई अफेयर्स प्रोफेसर आसिफ हुसैन ने दोनों किताबों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि मोहतरमा रख़्शन्दा रूही मेहदी उर्दू और हिंदी अदब का एक बड़ा नाम हैं। उनकी लिखी किताबें प्रशंसनीय हैं। इसी वजह से हमने इन दोनों किताबों के विमोचन की यह समारोह आयोजित किया।

सम्मेलन के अंत में किताब की लेखिका डॉक्टर रख़्शन्दा रूही मेहदी ने कहा कि सूफी अदब को पढ़ना या लिखना तब तक कोई अर्थ नहीं रखता जब तक सूफी तस्लीमात पर अपनी जिंदगी न गुजारी जाए। इकबाल के शेर को पढ़ते हुए उन्होंने सभी मेहमानों का शुक्रिया अदा किया।

डॉक्टर जावेद हसन, असिस्टेंट प्रोफेसर, उर्दू विभाग, जामिया मिलिया इस्लामिया ने कार्यक्रम की संचालन बहुत बेहतरीन अंदाज में किया। उन्होंने दोनों किताबों से चुने हुए उद्धरण पढ़कर सुनाए और अपने खास अंदाज में कई शेर भी पढ़े। राष्ट्रगान के बाद शानदार चाय के साथ यह समारोह अपने समापन पर पहुँचा।