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तैरते शव और डूबती इनसानियत

मेरे घर के सामने से एक बड़े अस्पताल का रास्ता जाता है। आजकल इस रास्ते पर सुबह से लेकर रात तक एंबुलेंस अनगिनत चक्कर काटती हैं। मुझे लगता है कि कुछ लोग सांस लेने जा रहे होंगे और कुछ सांस छोड़कर जा रहे होंगे। किसी के मर जाने पर जब वेंटिलेटर बेड खाली होता है तो उसके लिये रिश्तेदार यूं दम लगाते हैं जैसे तबादला करवाने के लिये मंत्री जी के पास सैकड़ों सिफारिशें आती हैं।

हवा का उलटा है ‘वाह’। और हवा की चारों तरफ वाह-वाह हो रही है। दवा का उलटा है ‘वाद’। दवाओं पर पूरा वाद-विवाद छिड़ा है। पहले बड़े बूढ़ों के मुख से सुनने को आम मिलता था कि आजकल की तो हवा ही खराब है। तब का तो पता नहीं पर आजकल की हवा ने तो कइयों की हवा निकाल दी है।
कोई पूछे कि बागों में बहार है तो जवाब है कि बहार का तो पता नहीं पर गंगा में लाशों की भरमार है। बेचारी लाशों का अंतिम संस्कार भी विधिपूर्वक नहीं हो पा रहा है। शवों की बेकद्री उसके परिजनों की संवेदनहीनता का हस्ताक्षर है। मुर्दे नदियों में तैर रहे हैं और इनसानियत शर्म से डूबकर मर रही है।

जीते जी दुर्गति की तो सुनी थी पर मरने के बाद ऐसा मंजर कभी सामने नहीं आया। जीवन के पांच अनिवार्य तत्वों में से हवा और अग्नि ही बेचारों को नहीं मिल रही। ऐसा क्रूर काल है कि चार कंधे और श्मशान में कोना भी नसीब नहीं हो रहा है। लोग सरकार की कब्र खोदने में जुटे हैं और इधर कब्रिस्तानों-श्मशानों में लोगों को जगह नहीं मिल रही। याद रहे कि असंख्य असामयिक मौतों के साथ-साथ कयामत ढाने वालों की कतार का भी जन्म हो रहा है। तो क्या समय आने पर सरकारों का भी चुपचाप यूं ही विसर्जन कर दिया जायेगा? सरकारों की भी ऐसी विदाई होगी कि उन्हें सीटों के लाले पड़ जाएंगे।
कोरोना ने सबको बेहोश कर रखा है। होश आते ही महामारी के पंजों से घायल मानस शासन को पलटने में पल नहीं लगायेंगे। समय का हथौड़ा ही हमारे उन नेताओं के अहंकार की लौह-परतों को चूर करके दम लेगा जो त्रासदी भरे विषाद की इस घड़ी में भी आडम्बर की चादर ओढ़े फीते काटने में लीन हैं।

शमीम शर्मा

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