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कर्म में कुशलता ही योग है – मुक्तिनाथानन्द

राजधानी में सत्संग के दौरान शनिवार के प्रात:कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानन्द ने बताया कि भगवत् प्राप्ति के लिए दो प्रधानता हैं- एक दान आदि करना व दूसरा मन ही मन भगवान को आंतरिक होकर पुकारना। स्वामी ने बताया कि जिसे श्री रामकृष्ण कहते है मनोयोग और कर्मयोग। पूजा,तीर्थ,जीव सेवा तथा गुरु के उपदेश के अनुसार कर्म करने का नाम है कर्म योग। उन्होंने कहा कि जनक आदि जो कर्म करते थे उसका नाम भी कर्म योग है। योगी लोग जो स्मरण मनन करते हैं उसका नाम है मनोयोग। भगवत् गीता में इसकी विषद् चर्चा हुई जहाँ पर कहा गया है कि मन ही मन जो भगवान प्राप्ति के लिए विचार करता है वह एक मार्ग है और दूसरा मार्ग है निष्काम कर्म योग के माध्यम से। श्रीकृष्ण कहते हैं योग: कर्मसु कौशलम् अर्थात कर्म में कुशलता ही योग है भगवत् प्राप्ति का उत्तम उपाय है और पक्षांतर में मन को भगवान नाम से समाहित करना वह भी भगवान से जुड़ने का एक उत्तम प्रक्रिया है। अब अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से प्रश्न किया है कि इन दोनों मार्गो से कौन सा मार्ग बेहतर है, कौन श्रेष्ठ है, यह कृपा पूर्वक मुझे बताइए। भगवान ने उनको समझाया कि सबके लिए मन को समाहित करना संभव नहीं है इसलिए जो दान आदि कर्म है, सद्कर्म है, दूसरों की सेवा करना है इन सब निष्काम कर्म से हम वहीं लक्ष्य तक पहुंचेंगे जहां पर योगी लोग भी मनन शीलता के माध्यम से पहुँचते हैं।

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