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राज्य यहाँ है, विकास कहाँ है ?

सपनों का राज्य उत्तराखंड बन तो गया पर माँग केवल राज्य बनाने की नहीं थी राज्य के विकास की भी थी। पहले बात नया राज्य बनाने की नही थी अपितु मण्डल कमीशन का विरोध पौड़ी रामलीला मैदान में चल रहा था, बाद में गुस्साए आंदोलनकारियों ने कहा अब अलग मंडल कमीशन नही अलग राज्य चाहिये। यहा से उत्तराखंड राज्य बनने की चिंगारी ने जन्म लिया। उत्तराखंड बनाने का सपना देखना जितना आसान है, उसको बनाने के लिए संघर्ष उतना ही मुश्किल। हर उत्तराखंडवासियों ने इस जटिल परिस्थितियों का सामना बड़ी हिम्मत और बहादुरी के साथ किया जिसके परिणाम स्वरूप 8 वर्ष के लंबे संघर्ष (कर्फ्यू, दंगे, मुजफ्फरनगर कांड, खटीमा-मसूरी कांड, रामपुर तिराहा कांड आदि) और कई बलिदानों के बाद उत्तराखंड का गठन हुआ। उत्तराखंड का गठन भाजपा सरकार द्वारा किया गया तब राज्य में भी भाजपा की सरकार थी और केंद्र में भी भाजपा सरकार थी।

विकास की पटरी पर नहीं चल रहा उत्तराखंड
2000 में सपनों का राज्य उत्तराखंड मिला किन्तु विकास नही। इसका मुख्य कारण रही राजनीतिक अस्थिरता चाहे सरकार भाजपा की आयी हो या कोंग्रेस की पर किसी ने भी आम जनता को नही जोड़ा। राजनीतिक गलियों में शोर चुनाव के समय होता है, गाँवों-कस्बों-नगरों में खूब दौरे और जनता से वाद-संवाद भी चलता है, बहुत से चुनावी वादे होते है और जीतने के बाद उन राजनीतिक गलियारों में वापस शांति पसर जाती है। जब राजनीतिक दलों पर सवाल दागे जाते है कि कहाँ है विकास ? तो उनका जवाब होता है सड़के बना दी, रेल लाइन बिछा रहे है, पर क्या सड़के, रेल और प्लेन पहुँचना ही विकास होता है और मूलभूत सुविधाओं का क्या ? रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और अनेक मूलभूत सुविधाएं न मिल पाने के कारण पलायन का दौर शुरू हुआ और आज पलायन की दर बहुत मात्रा में बढ़ गयी है, जिस कारण गाँव खाली होते जा रहे है।
हर बार राज्य सरकार की बैठकें, पहाड़ के विषयों की समीक्षाएँ और योजनाएँ AC हॉल में बैठकर बनाई जाती है। उनको यह नही पता होता 700 km दूर स्थित गाँव में में बसे लोग किन मुश्किलों का सामना कर रहे है।
कहने के लिए सभी पार्टी की सरकारों ने सब मूलभूत सुविधाएं पूरी की है विद्यालय, हॉस्पिटल इत्यादि बनाये है पर पर क्या वे सब चलती हुई स्थिति में है ? पहाड़ो में विद्यालयों की स्थिति दयनीय है बिल्डिंग गिरने को तैयार है, हॉस्पिटल सुविधाएं सुचारू रूप से नहीं चल रही है जिसके कारण कई लोगों को जान से हाथ धोना पड़ता है, जिसका विकराल रूप कोरोना काल में देखा गया है। कोरोना काल में सच सामने आया कि न गाँव में दवाये है, न टेस्टिंग सुविधा, न इलाज सब भगवान भरोसे।

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स्वाति नेगी