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मानसिकता की सारी गड़बड़

मुझे लगता है हर किसी मन में कुछ पाने की दौड़ हमेशा नचाती है। अक्सर ऐसे में वह छूट जाता है जो सामने है, जो वर्तमान क्षण है। आप जो भी पाने के लिए दौड़ेंगे, वही नहीं मिलेगा।

अहिंसक होना चाहेंगे, हो नहीं पाएँगे। शांत होना चाहेंगे, शांत नहीं हो पाएँगे। संसार से भागना चाहेंगे, भाग नहीं पाएँगे। जो भी होना होता है। वह कभी भी आपकी चाह से नहीं होता। चाह से चीजें दूर हटती जाती हैं। चाह दरअसल बाधा है। आप जो हो बस उसी के साथ राजी हो जाएँ। यही सुखी जीवन का मूल मंत्र है। तो पूरे होश के साथ आप अपनी सजगता बनाए रखें। प्रकृति स्वयं सब सिद्ध करेगी।

कभी सोचा है आपने, यह भ्रम किसने फैलाया कि स्त्री पर हाथ नहीं उठाया जाना चाहिए? तो चलिए आज कुछ इतिहास के तथ्यों के माध्यम से समझते हैं आंखिर हम किस हद तक सही हैं? हमारा पहाड़ किस दिशा की तरफ बड़ रहा है? विचार करियेगा…

हनुमान जी ने भी दो गदा खींच के मारा था लंकिनी को, भरत जी ने अपनी माँ कैकेई को भला बुरा सुनाया था, ज़रूरत पड़ने पर लक्ष्मण जी ने सूर्पनखा का नाक काट दिया, भगवान श्री कृष्ण ने भी पूतना का वध किया था!

जब रानी चेनम्मा और रानी लक्ष्मीबाई युद्ध के मैदान में गयी तो क्या स्त्री समझ कर उन पर वार नहीं किया गया होगा? युद्ध का मैदान स्त्री पुरुष का भेद क्या जाने?

कन्या है तो हाथ मत उठाओ, आखिर क्यों भाई? गलती करेगी तो मार भी पड़ेगी जैसे बेटे को पड़ती है, सब सुविधा दो लेकिन हाथ मत उठाओ?

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इसी मानसिकता ने सारी गड़बड़ की है, दो थप्पड़ बचपन में लगाओ और फिर बताओ की तुम कहीं की परी नहीं हो, गलती करोगी तो कुटाई भी होगी, तब जाकर वह एक दम सही रास्ते पे चलेगी

सारा काम मेरी गुडिया, मेरी रानी, मेरी परी करने वालों ने बिगाड़ा है, लेकिन जब उनकी बेटी लव जिहाद का शिकार हो जाती है तब उनके पास छाती पीटने के अलावा कोई उपाय नहीं बचता, एक घटना देखने को मिला है जिसमें अपनी बेटी को तो सुधार नहीं पाए लेकिन श्राद्ध जरूर किए थे तो आखिर ऐसा नौबत क्यों आया?

लड़का और लड़की दोनों को हमारा धर्म और कानून समानता का अधिकार देता है लेकिन अक्सर यह देखने को मिलता है गलती चाहे लड़की करे फिर भी ज्यादातर दोष लड़कों के ऊपर डाल दिया जाता है।

आजकल अक्सर आपको बड़े शहरों में देखने को मिलेगा की बहुत सी लड़कियां नशा करती है, गलत रास्ते पर चलती है और इसका असर धीरे-धीरे छोटे-छोटे शहरों के साथ गांव में भी आने लगा है। इस पर हमारे देश की सिनेमा का बहुत बड़ा हाथ है। सास भी कभी बहूँ थी दिखाकर संयुक्त परिवारों का बंटाधार किया है। कौन और क्यूँ कोई सुध लेगा। जिसका सम्राट ही घर-परिवार त्याग आधुनिक महात्मा बन बैठा हो।

राजकुमार परिहार