उत्तराखण्ड में आंदोलन क्यों ठहर जाते हैं:-

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देवेश आदमी
- जनसांख्यिकी, आजीविका, राजनीतिक हस्तक्षेप और जनभागीदारी के टूटते सूत्र..
- एक वक्त के बाद आंदोलन राजनीतिक लोगों के हाथ में चला जाता हैं..
- राज्य में बुजुर्गों महिलाओ की संख्या का आधा भी युवा वर्ग नहीं…
अलग राज्य आंदोलन के बाद उत्तराखण्ड में आंदोलनों की कमी नहीं रही जल्दमोडा शिक्षा आंदोलन, पेपर लीक आंदोलन, चिकित्सा आंदोलन, जंगली जानवरों के आतंक के खिलाफ आंदोलन, अंकिता भंडारी न्याय आंदोलन, चिलरखाल सड़क, वन अधिनियम जैसे अनेक बड़े मुद्दों पर लोग सड़कों पर उतरे। इसके बावजूद लगभग हर आंदोलन नतीजे तक नहीं पहुँच सका। न आंदोलन के बाद कोई ठोस, दीर्घकालिक नीति बनी, न ही जनता लंबे समय तक उनसे जुड़ी रह सकी। यह सवाल अब केवल असफल आंदोलनों का नहीं, बल्कि उत्तराखण्ड की सामाजिक-राजनीतिक संरचना का बन चुका है।
उत्तराखण्ड को बने 25 वर्ष हो गए जहाँ राज्य युवा अवस्था में जा रहा था वहीं युवा काल से पहले बुजुर्ग हो गया। सबसे बड़ा कारण है कि उत्तराखण्ड आज तेजी से बुज़ुर्गों का प्रदेश बनता जा रहा है। पलायन ने गाँवों से युवा छीन लिए हैं। जो बचे हैं, वे या तो बुज़ुर्ग हैं या महिलाएँ। बुज़ुर्गों के लिए लंबे समय तक आंदोलन में सक्रिय रहना शारीरिक रूप से संभव नहीं। महिलाएँ आंदोलन की आत्मा तो हैं, लेकिन उनके कंधों पर खेती, पशुपालन, पानी-लकड़ी-चारा, बच्चों और बुज़ुर्गों की जिम्मेदारी है। वे एक-दो दिन आंदोलन में जाती हैं, तीसरे दिन संख्या घटने लगती है और सप्ताह होते-होते आंदोलन बिखर जाता है। यह उनकी कमजोरी नहीं, उनकी मजबूरी है। सच्चाई यह भी है कि जो महिला लंबे समय तक आंदोलन में दिखे, प्रायः वही होती है जिस पर खेती, बच्चों या मवेशियों की सीधी जिम्मेदारी नहीं होती। यह कटु यथार्थ आंदोलन की निरंतरता को तोड़ देता है।
दूसरा बड़ा कारण है आजीविका का संकट। प्रदेश का युवा इतना कठिन जीवन जी रहा है कि उसके लिए आंदोलन करना विलास बन गया है। जो युवा बाहर हैं, वे कमाने-खाने की जद्दोजहद में इतने उलझे हैं कि गाँव और आंदोलन के लिए समय नहीं निकाल पाते। जो गाँव में हैं, वे स्कूल-कॉलेज, प्रतियोगी परीक्षाओं और सीमित अवसरों की दौड़ में फँसे हैं। आंदोलन में शामिल होने का मतलब है रोज़ी-रोटी से समझौता और यह समझौता अधिकतर लोग लंबे समय तक नहीं कर सकते।
तीसरा कारण है आंदोलनों का टूटना और भटकना। आंदोलन से जुड़े लोग या तो प्रशासनिक दबाव में आ जाते हैं, या राजनीति में खींच लिए जाते हैं, या फिर प्रलोभनों की छाया उन्हें घेर लेती है। कई आंदोलन या तो किसी राजनीतिक दल में समाहित हो जाते हैं, या फिर नई पार्टी बनाने की दिशा में मुड़ जाते हैं। इससे आंदोलन का मूल उद्देश्य कमजोर पड़ता है और आम लोग उससे कट जाते हैं। जनता को लगने लगता है कि आंदोलन भी अंततः सत्ता या पद की सीढ़ी है।
चौथा कारण है जनआंदोलन का संस्थागत रूप न ले पाना। दुनिया का कोई भी बड़ा आंदोलन देखें—वे आम लोगों द्वारा उठाए गए, संगठित हुए और अंततः नीति में बदले। उत्तराखण्ड में आंदोलन अक्सर घटना-केंद्रित रहते हैं, संस्था-केंद्रित नहीं बन पाते। स्पष्ट नीति-प्रस्ताव, वैकल्पिक ड्राफ्ट, कानूनी रणनीति और आंदोलन के बाद का फॉलो-अप तंत्र नहीं बनता। सरकारें समय काट लेती हैं, आश्वासन देती हैं और आंदोलन धीरे-धीरे ठंडा पड़ जाता है।
पाँचवाँ कारण है राजनीतिक निर्भरता। आज प्रदेश की स्थिति इतनी खराब हो गई है कि यदि कोई राजनीतिक पार्टी मुद्दा न उठाए, तो वह मुद्दा लगभग अदृश्य हो जाता है। स्वतंत्र जनस्वर कमजोर हो चुकी है। जो आवाज़ें हैं, वे किसी न किसी दल या संस्था से जुड़ी हैं। परिणामस्वरूप आंदोलन “जनता बनाम व्यवस्था” न रहकर “दल बनाम दल” बन जाते हैं।
छठा और चिंताजनक कारण है युवा विमुखता। 2022 के विधानसभा चुनावों की तुलना में आज पहाड़ों में युवाओं की रैलियों में उपस्थिति और कम हो गई है। रैलियों की औसत उम्र लगभग 50 वर्ष हो चुकी है। महिलाओं की भागीदारी लगभग 70% तक पहुँच गई है, जो एक ओर उनकी चेतना दिखाती है, तो दूसरी ओर युवाओं की अनुपस्थिति को उजागर करती है। यह संकेत है कि युवा राजनीति और आंदोलनों से भरोसा खो रहा है।
अंततः यह मानना होगा कि उत्तराखण्ड के आंदोलन इसलिए असफल नहीं हो रहे कि मुद्दे छोटे हैं, बल्कि इसलिए कि प्रदेश अब और बोझ नहीं झेल सकता। बुज़ुर्ग, महिलाएँ और संघर्षरत युवा इनके कंधों पर टिके आंदोलन लंबे समय तक नहीं चल सकते, जब तक उन्हें आजीविका-सुरक्षित, संस्थागत और गैर-राजनीतिक रूप न दिया जाए। उत्तराखण्ड को अब केवल आंदोलन नहीं, बल्कि टिकाऊ जनआंदोलन की नई संस्कृति चाहिए जो आम लोगों के जीवन की सच्चाइयों से जुड़ी हो और सत्ता को नीति बनाने के लिए मजबूर कर सके।