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दौर-ए-तहजीब :-जब राजनीति में नीति, मर्यादा और आलोचना का सम्मान हुआ करता था..

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देवेश आदमी

भारतीय राजनीति का एक दौर ऐसा भी था जब सत्ता और विपक्ष के बीच मतभेद होते थे, टकराव होता था, लेकिन मर्यादा नहीं टूटती थी। वह समय 1960 के आसपास का था जब विचारधाराएँ टकराती थीं, पर संस्थाएँ मजबूत रहती थीं और आलोचना को देशद्रोह नहीं माना जाता था। 1960 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी को विदेश भेजा। यह कोई साधारण घटना नहीं थी। अटल जी उस समय जनसंघ के तेज़तर्रार नेता थे और नेहरू की नीतियों के प्रखर आलोचक भी। फिर भी नेहरू ने विपक्ष की प्रतिभा को पहचाना और राष्ट्रहित में उसका उपयोग किया। यह निर्णय सत्ता की उदारता और लोकतांत्रिक आत्मविश्वास का उदाहरण था।

इसी तरह रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जो नेहरू और इंदिरा गांधी के सबसे मुखर आलोचकों में गिने जाते थे उन्हें राज्यसभा में मनोनीत किया गया। दिनकर जी ने संसद में खड़े होकर कविता के माध्यम से सत्ता की नीतियों पर तीखे प्रहार किए। उन्होंने नेहरू की विदेश नीति, सामाजिक दृष्टिकोण और सत्ता के केंद्रीकरण की आलोचना की, फिर भी न उन पर पाबंदी लगी, न उन्हें चुप कराया गया। नेहरू जानते थे कि आलोचना सत्ता को कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत बनाती है।

यही कारण था कि 1964 में जब नेहरू का निधन हुआ, तो अटल बिहारी वाजपेयी जो वैचारिक रूप से उनसे सहमत नहीं थे ने संसद में कहा, “आज इस सदन से मर्यादा पुरुषोत्तम चला गया।” यह कथन सिर्फ एक व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति के लिए था जिसमें विरोध के बावजूद सम्मान बना रहता था। अटल जी ने कभी नेहरू को अपमानित नहीं किया। वे कई नीतियों से असहमत थे, लेकिन असहमति को व्यक्तिगत द्वेष में नहीं बदला। एक वाक्या यह भी हैं कि अटल जी को घुटने की गंभीर बीमारी हो गई थी जिस का इलाज भारत में तब सम्भव नहीं था राजीव गाँधी जी को यह मालूम हुआ तो उन्होंने अटल जी को अमरीका घुटने के इलाज के लिए भेजा और उन का सफल ऑपरेशन हुआ। यह पक्ष विपक्ष नीति अनीति से लग इंसानियत दिखाता हैं। राजनीति से बाहर का भी एक जीवन हैं यह उस दौर के नेता चरितार्थ करते थे।

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यह भी उल्लेखनीय है कि अटल जी ने अपने कार्यकाल की विफलताओं चाहे कंधार विमान अपहरण हो या कारगिल युद्धका दोष नेहरू पर नहीं मढ़ा। उन्होंने माना हमारी इंटेलिजेंटबिफल हुआ इनपुट्स होने के बावजूद भी हम कुछ नहीं कर सके परंतु उन्होंने इतिहास को जिम्मेदारी से देखा, न कि बहाने के रूप में इस्तेमाल किया। यही नेतृत्व की परिपक्वता थी। इसके उलट, समकालीन राजनीति में आलोचना के प्रति रवैया पूरी तरह बदल चुका है। कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि वे आलोचना से सीखते हैं, आलोचक उन्हें बेहतर बनाते हैं। कथन सुनने में लोकतांत्रिक लगता है, लेकिन व्यवहार इसके विपरीत दिखाई देता है। आज आलोचना को दबाने, सवाल पूछने वालों पर पाबंदी लगाने, पत्रकारों, लेखकों, छात्रों और विपक्षी नेताओं को निशाना बनाने का सिलसिला अभूतपूर्व स्तर पर पहुँच चुका है। आलोचना का सामना करने के बजाय उसे देशविरोध, एजेंडा या साजिश बताकर खारिज किया जा रहा है।

यही विरोधाभास आज की राजनीति की सबसे बड़ी समस्या है कथन और कर्म के बीच गहरी खाई। नेहरू ने आलोचना को सम्मान दिया, क्योंकि उन्हें अपने विचारों और संस्थाओं पर भरोसा था। आज सत्ता आलोचना से डरती दिखती है, क्योंकि संस्थाएँ कमजोर और सत्ता अत्यधिक केंद्रीकृत होती जा रही हैं। दरअसल, लोकतंत्र की असली परीक्षा सत्ता में रहकर आलोचना सहने की क्षमता से होती है। नेहरू और अटल का युग यह सिखाता है कि असहमति देश को तोड़ती नहीं, बल्कि उसे मजबूत करती है। जब आलोचना को दबाया जाता है, तब लोकतंत्र नहीं, सिर्फ सत्ता बचती है।

आज जरूरत है उसी राजनीतिक परंपरा को याद करने की जहाँ नीति थी, नियम थे, मर्यादा थी; और जहाँ आलोचक दुश्मन नहीं, लोकतंत्र के प्रहरी माने जाते थे।

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