“पप्पू” किसे बना दिया गया?

देवेश आदमी
- राहुल गाँधी नहीं, भारतीय जनता को मूर्ख बनाने की राजनीति..
- करोड़ों फूंक गए पर राहुल गाँधी असली पप्पू नही निकला..
देवेश आदमी
पिछले कुछ वर्षों में “पप्पू” शब्द भारतीय राजनीति का सबसे सुनियोजित और सबसे महँगा राजनीतिक हथियार बन गया। इतना प्रचलित हुआ कि समाज ने अनजाने में इसे सच मान लिया यहाँ तक कि लोगों ने अपने बच्चों का नाम पप्पू रखना बंद कर दिया, और जिनका नाम पप्पू था उन्होंने भी असहज होकर नाम बदलना बेहतर समझा। पर असली सवाल यह है कि समाज इस पूरे खेल को समझ ही नहीं सका। “पप्पू” शब्द राहुल गाँधी के लिए गढ़ा गया था, लेकिन इसका असर जनता की सोच पर पड़ा और यहीं पर राजनीति ने जनता को ही पप्पू बना दिया।
बीजेपी ने राहुल गाँधी को “कम बुद्धि”, “मंदबुद्धि” और “अयोग्य” साबित करने के लिए वर्षों तक एक संगठित प्रचार तंत्र चलाया। सोशल मीडिया, आईटी सेल, विज्ञापन, रैलियाँ, टीवी डिबेट, ट्रोल आर्मी हर मंच पर एक ही बात दोहराई गई: राहुल गाँधी पप्पू हैं। लेकिन इस प्रचार की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस व्यक्ति को पप्पू कहा गया, वही राहुल गाँधी दुनिया की प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किए जाते हैं, वैश्विक मंचों पर सुने जाते हैं और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में गंभीर राजनीतिक नेता के रूप में विश्लेषित किए जाते हैं।
राहुल गाँधी की शिक्षा पर नज़र डालें तो तथ्य बिल्कुल अलग कहानी कहते हैं। उन्होंने अमेरिका के Rollins College (Florida) से स्नातक शिक्षा प्राप्त की और इसके बाद Trinity College, Cambridge University (UK) से MPhil (Development Studies) की डिग्री ली। यह कोई साधारण उपलब्धि नहीं है। कैम्ब्रिज जैसी संस्था में प्रवेश और अध्ययन अपने आप में बौद्धिक क्षमता और अकादमिक योग्यता का प्रमाण होता है। इसके बावजूद उन्हें “पप्पू” कहकर खारिज कर दिया गया क्योंकि राजनीति में तथ्य नहीं, धारणा बेची जाती है।
अब सवाल उठता है कि जो लोग राहुल गाँधी को पप्पू कहते हैं, उनकी अपनी शिक्षा, योग्यता और बौद्धिक तैयारी क्या है? क्या वे भी किसी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय से पढ़े हैं? क्या वे किसी नीति, अर्थशास्त्र, समाज या लोकतंत्र पर तार्किक बहस करने की क्षमता रखते हैं? या वे सिर्फ़ व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के प्रमाणपत्रधारी हैं, जिन्हें जो परोसा गया, वही सच लगने लगा?
सबसे बड़ा और सबसे अनदेखा सच यह है कि राहुल गाँधी को पप्पू साबित करने के लिए करीब 2800 करोड़ रुपये से अधिक का प्रचार तंत्र खड़ा किया गया और यह पैसा बीजेपी का निजी नहीं था, यह जनता का पैसा था। टैक्स, सरकारी विज्ञापन, आईटी सेल, CSR, राज्यों से जुटाया पार्टी फंड, मीडिया मैनेजमेंट सब कुछ जनता के पैसे से। यानी राहुल गाँधी को पप्पू कहने की प्रक्रिया में असल में जनता का ही पैसा फूँका गया, और उसी पैसे से जनता की सोच को मोड़ा गया। इस तरह “पप्पू” राहुल गाँधी नहीं बने जनता खुद का पप्पू बन गई, और दुखद यह कि वह इस पर खुश भी है।
यह राजनीति की सबसे खतरनाक सफलता है लोगों को यह यकीन दिला देना कि वे बहुत समझदार हैं, जबकि उनकी जेब से पैसा निकालकर उनकी ही बुद्धि का मज़ाक उड़ाया जा रहा है। लोग खुश हैं कि राहुल गाँधी कम दिमाग के हैं, पर यह नहीं पूछते कि उन्हें यह बताने में उनका अपना पैसा क्यों खर्च किया गया। असल पप्पू वही होता है जिसे ठगा जाए और उसे एहसास भी न हो।
यह लेख राहुल गाँधी की वकालत नहीं, बल्कि जनता से सवाल है अगर किसी को पप्पू साबित करने में आपका पैसा लग रहा है, तो पप्पू कौन है? राजनीति तब तक यही खेल खेलती रहेगी, जब तक जनता यह सवाल पूछना शुरू नहीं करेगी।
