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प्रोफ़ेसर मज़हर आसिफ़ के बयान की गलत व्याख्या प्रस्तुत की गई इसे व्यापक और शैक्षिक संदर्भ में समझने की जरूरत

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डॉ. कुर्रतुलऐन

जामिया मिल्लिया इस्लामिया के कुलपति प्रोफ़ेसर मज़हर आसिफ़ के बयान को लेकर जो विवाद खड़ा किया जा रहा है, वह दरअसल उनके शब्दों की ग़लत और सतही व्याख्या का नतीजा है। अगर इस बयान को व्यापक, शैक्षिक और सांस्कृतिक संदर्भ में समझा जाए, तो साफ हो जाता है कि इसमें न तो कोई भड़काऊ बात है और न ही किसी तरह का टकराव पैदा करने की कोशिश। इसके उलट, इसमें राष्ट्रीय एकता, आपसी सौहार्द और साझा सांस्कृतिक विरासत का सकारात्मक संदेश है।
हक़ीक़त यह है कि भारत की धरती सदियों से अलग-अलग धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों का घर रही है। यहां विविधता के बावजूद एकता की मज़बूत परंपरा रही है। ऐसे में जब कोई व्यक्ति प्रतीकात्मक या रूपक के रूप में अपनी बात कहता है, तो उसका मतलब कोई वैज्ञानिक या धार्मिक दावा करना नहीं होता, बल्कि वह एक बड़े सामाजिक और सांस्कृतिक सच की ओर इशारा कर रहा होता है।

प्रोफ़ेसर मज़हर आसिफ़ के बयान में “डी.एन.ए” शब्द का इस्तेमाल भी इसी तरह प्रतीक के रूप में किया गया है। इसका मतलब यह नहीं कि सभी लोगों का जैविक डी.एन.ए एक जैसा है, बल्कि इसका आशय यह है कि हमारी संस्कृति, इतिहास और सामाजिक जड़ें आपस में जुड़ी हुई हैं। भारत एक प्राचीन सभ्यता है, जहां हज़ारों साल से अलग-अलग परंपराएं साथ-साथ विकसित हुई हैं। “महादेव का डी.एन.ए” कहना इसी साझा सांस्कृतिक विरासत की ओर इशारा करता है।
अगर तर्क की बात करें, तो दुनिया भर में लोग अपनी साझा पहचान को दिखाने के लिए ऐसे प्रतीकों का इस्तेमाल करते हैं। इसी तरह धार्मिक दृष्टि से भी इस विचार को समझा जा सकता है। इस्लाम भी इंसानी एकता की बात करता है। कुरान शरीफ़ में कहा गया है कि “हमने तुम सबको एक ही मर्द और एक ही औरत से पैदा किया।” यानी पूरी इंसानियत की शुरुआत एक ही जगह से हुई है।

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इसलिए अगर कोई व्यक्ति भारतीय संदर्भ में किसी प्रतीक के जरिए एकता का संदेश देता है, तो उसे तुरंत धार्मिक नज़रिए से टकराव की तरह देखना सही नहीं है। इस्लाम यह भी सिखाता है कि दूसरे धर्मों और उनके मानने वालों का सम्मान किया जाए और उनके धार्मिक प्रतीकों का अपमान न किया जाए।

प्रोफ़ेसर मज़हर आसिफ़ के बयान में भी यही बात सामने आती है कि अलग-अलग धर्मों के लोग मिल-जुलकर रह सकते हैं। उन्होंने महादेव के परिवार का उदाहरण देकर यही समझाने की कोशिश की कि अलग-अलग प्रकृति के लोग भी एक साथ शांति से रह सकते हैं। यह “विविधता में एकता” की सोच है, जो भारत की पहचान है।
जहाँ तक यह बात है कि “हमारा धर्म इस्लाम है”, तो यह बिल्कुल सही है। हर मुसलमान अपने धर्म पर क़ायम है और रहेगा। लेकिन इसके साथ यह भी सच है कि हम सब एक ही देश के नागरिक हैं और हमारी सांस्कृतिक जड़ें आपस में जुड़ी हुई हैं। कई मुस्लिम परिवारों की जड़ें इसी जमीन से जुड़ी हैं, और इतिहास में अलग-अलग समय पर लोगों ने इस्लाम क़ुबूल किया है।
इसलिए इस बयान को इस तरह समझना ज़्यादा सही होगा कि हमारी सांस्कृतिक पहचान भारतीय है और हमारा धर्म इस्लाम है। दोनों में कोई टकराव नहीं है। एक व्यक्ति एक अच्छा नागरिक भी हो सकता है और अपने धर्म पर पूरी तरह क़ायम भी रह सकता है।

अंत में यही कहा जा सकता है कि ऐसे बयानों को विवाद बनाने के बजाय उनके सकारात्मक पहलू को समझना चाहिए। अगर कोई व्यक्ति एकता, सद्भाव और साझा मूल्यों की बात कर रहा है, तो उसकी नीयत और मक़सद को ध्यान में रखना चाहिए, न कि शब्दों को तोड़-मरोड़ कर विवाद खड़ा करना चाहिए। आज के समय में हमें विभाजन नहीं, बल्कि एकता की ज़रूरत है, और ऐसे विचार उसी दिशा में एक क़दम हैं।

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