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राजनीति में युवाओं का दोहन

यदि मैं अपने स्कूल के दिनों की बात करूं तो हमें महिला मित्र पुरुष मित्र के मध्य का फर्क मालूम नही था हम नशे से दूर थे चिट्ठी के दौर में मोबाईल फोन एक कल्पना थी। टेपरिकार्डर सुनते थे और रेडियो से बेहतर कोई टाइमपास नही था। उस दौर में राजनीति सिर्फ वही करता था जो चुनाव लड़ता था। नेता शब्द सम्मानजनक था और नेता जी पद्मश्री जैसा। स्कूल में GM का चुनाव ही बहुत बड़ा चुनाव था उस के लिए मात्र 3 दिन का समय मिलता था । समय बीता हम स्नातक के लिए शहर आये और देहरादून में आखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ गए हालांकि यह सफर बहुत लम्बा नही रहा देहरादून से मेरठ की गाड़ी पकड़ते ही 3 वर्ष बाद हम कॉलेज राजनीति से भी दूर चले गए और भूल गए कि रोजी रोटी के सिवाय भी कहीं दुनिया सांस लेती हैं।

अब 3 वर्ष पूरे हुए गाँव मे डेरा डाले हालात सुधरते इस से पहले करोना काल आगया और हम पुनः जीरो से सुरवात करने पर मजबूर हो गए हालांकि यह भी एक जीवन का अनुभव हैं जो अर्निंग नही लर्निंग अछि दे रहा हैं। मैं विगत 7 वर्षों से सक्रिय राजनीति से जुड़ा हूँ इस के लिए दिल्ली उत्तराखण्ड में बहुत काम किया किन्तु काम अपनी शर्तों पर कर रहा हूँ हमारे स्कूली दिनों में मैंने कभी किसी छात्र को राजनीतिक पार्टी से जुड़ा नही देखा। कभी कोई छात्र किसी पार्टी प्रतिनिधि के लिए लड़ता झगड़ता नही देखा। कॉलेज के दिनों में मात्र 20 से 30% छात्र चुनावों के दौरान राजनीति से जुड़े देखें उस में उन का आर्थिक स्वार्थ होता था वे छात्र कॉलेज के किसी पद पर होते थे पर आम विद्यार्थियों को मैंने राजनीतिक विचारधारा में बहते नही देखा।
वर्तमान परिस्थिति इस कदर बिखरी हैं कि मैट्रिक कर रहे बच्चे का भी किसी खास पार्टी की लगाव हैं वह राजनीतिक विचारधारा के व्यक्ति से सीधा जुड़ा है। स्कूली बच्चों से क्षेत्र ल विद्यायक सीधा काम लेते हैं जनप्रतिनिधियों की पहुंच कहें या विद्यार्थियों की यह समझ नही आता। अनेकों बार बच्चों को पार्टी बहस करते देखा हैं संचार क्रांति के दौर में बच्चे बहुत बेहतरीन ढंग से राजनीतिक विषयों पर रोजाना सोशलमीडिया पर बहस कर रहे हैं। धार्मिक उन्नमाद में स्कूल के बच्चे लिप्त पाए जाते हैं। बच्चों को राजनीति में जबर्दस्ती घसीटा जा रहा हैं जिस से वे मूल मकसद से भटक रहे है। उत्तराखण्ड में इस की सुरवात राज्य बनने के साथ ही सुरु हुई। क्यों कि जनप्रतिनिधि स्थानीय थे और उन तक विद्यार्थियों को पहुच ओर स्कूल तक जनप्रतिनिधियों की पहुच बहुत आसान थी। यदि प्रदेश में विधानसभा, पंचायती चुनाव हैं या देश में लोकसभा चुनाव हैं तो हर स्कूल में चर्चा का विषय चुनाव होता हैं। हर बच्चा पार्टियों पर अपने राय देता फिरता है जब कि यह उन की उम्र से दूर व जिम्मेदारी से परे हैं। जिन की उम्र वोट देने की नही वह इंटरवल में प्रधानमंत्री तय कर देते हैं। विधायल कौन होगा किसे पार्टी टिगत देगी इस के विषय में सर्वे स्कूल में हो रहा है।
राजनीति में स्कूलों का ह्नस्तक्षेप सोचनीय विषय हैं। स्कूल के कार्यक्रमों में जनप्रतिनिधियों के मुख्य अतिथि होना बच्चों को राजनीतिक गपसप पर मजबूर कर रहा हैं। आज 15 से 30 वर्ष की उम्र का हर युवा किसी न किसी पार्टी का कट्टर वोटर हैं। यही उम्र कुछ करने की हैं जब युवा खुद को साबित करने के लिए दौड़ लगाना चाहता है। राजनीति सक्रियता से युवा नशे के आदी भी हो रहे हैं। धर्म राजनीति के आडम्बर में आज का युवा धीरे-धीरे धंस जाता हैं। धर्म के नाम पर युवाओं का साफ नजरिया हैं। अब जा युवा गंगा जमुना तहजीब को नही मानता हिन्दू मुस्लिम भाई-भाई को आज युवा नकारते हैं। गाँधी या गोडसे में सब का नजरिया साफ हैं। यदि आज आप एकता की बात करते हो तो आप को साफ जवाब मिलेगा पाकिस्तान चले जाना फिर। आज का युवा समझा रहा हैं कि आजादी गोली से आई या चरखे से। हरा रंग भगवा रंग आज एक ही कुर्ते में नही गढ़ सकते। या तो हरा ही होगा या भगवा। आलम इतना ही नही आप हरे कुर्ते को भगवा धागे से नही सिल सकते। आज आप गैर धर्म के लिए शांतुना नही दिखा सकते। सोशलमीडिया पर आप गैर मजहब के लिए शुभकामनाएं संदेश पोस्ट नही कर सकते हैं यह राजनीतिक पैंठ हैं यह राजनीति की असल तस्बीर है यह हुआ हैं राजनीतिक सक्रियता से गाँव में हालत। यह एक गाँव की नही हर गांव की कहानी हैं। आज यदि आप किसी गाँव चले जाओ तो झड़े देख आप आसानी से समझ जाओगे की मकान मालिक किस पार्टी को समर्थन देता हैं। अनेकों अनुष्ठानों में पार्टी के हिसाब से लोग पहुँचते हैं।
जिस के भयानक परिणाम हमें विकास को ताक पर रख के चुकाने पड़ते हैं। इस लिए भी विकास रुका हुआ हैं कि हम खुद को समर्पित कर चुके हैं। उत्तराखण्ड के जिस गांव में सब से अधिक पढ़ेलिखे लोग हैं उस गाँव में पलायन सब से अधिक हैं विकास सब से कम हुआ हैं और हर परिवार का राजनीतिक एजेंडा सिर्फ पार्टी हैं इस वजह से उस गाँव का गरीब तबका पिस रहा हैं। जिस में युवा सब से अड़ियल रुख अपना रहे हैं युवाओं को समझना होगा कि हम अपने बल बुद्धि का प्रयोग वहां करें जहां आवश्यकता हैं। शिक्षा की उम्र में राजनीति से दूर रहे जब समझने की उम्र हो जाएगी तब राजनीति में उतरें।

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देवेश आदमी